Friday, August 29, 2025
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भारतीय वैज्ञानिकों ने बनाई रंग बदलने वाली सामग्री, पहनने योग्य सेंसर और नक़ली वस्तुओं से सुरक्षा के लिए होगा उपयोग

नई तकनीक से बन रही है भविष्य की रंग-परिवर्तनशील सामग्री

बेंगलुरु स्थित नैनो एवं मृदु पदार्थ विज्ञान केंद्र (CENS) के वैज्ञानिकों ने एक ऐसी तकनीक विकसित की है, जो बिना किसी पिगमेंट या डाई के प्राकृतिक रूप से रंग बदलने वाली सामग्री बना सकती है। इस शोध में पॉलीस्टाइरीन नैनोस्फेयर (Polystyrene Nanospheres) का उपयोग किया गया है, जिनका आकार एक बालू के कण से भी हजार गुना छोटा है।

इस तकनीक को संरचनात्मक रंगीकरण (Structural Coloration) कहा जाता है, जो मोर के पंखों और तितलियों के पंखों में देखे जाने वाले प्राकृतिक रंगों की तरह काम करती है। इसमें रंग सतह की सूक्ष्म संरचना के कारण उत्पन्न होता है, न कि किसी रासायनिक रंग से।


कैसे काम करती है यह तकनीक?

वैज्ञानिकों ने देखा कि जब ये नैनोस्फेयर पानी की सतह पर तैरते हैं, तो वे स्वाभाविक रूप से षट्कोणीय आकृति में एक सपाट परत बना लेते हैं। इस प्रक्रिया को स्व-संयोजन (Self-assembly) कहते हैं। इसके बाद वैज्ञानिकों ने रिएक्टिव आयन एचिंग नामक विधि से इन संरचनाओं को थोड़ा-थोड़ा काटा, जिससे प्रकाश के परावर्तन के तरीके में बदलाव आया।

इस प्रक्रिया से तैयार की गई सामग्री में, जब प्रकाश विभिन्न कोणों से पड़ता है, तो परावर्तित रंग बदल जाते हैं—अर्थात देखने का कोण बदलने पर रंग बदलता है।


कहां होगा इसका उपयोग?

  • Wearable Sensors (पहनने योग्य सेंसर)
  • Anti-counterfeiting Tags (नक़ली वस्तुओं से सुरक्षा टैग)
  • Display Technologies (डिस्प्ले तकनीकें)
  • Eco-friendly Paints (पर्यावरण अनुकूल पेंट)

इस शोध को हाल ही में प्रतिष्ठित Journal of Applied Physics में प्रकाशित किया गया है।


क्या है इसकी खास बात?

  • यह रंग कभी फीके नहीं पड़ते क्योंकि ये रासायनिक रंगों की बजाय भौतिक संरचना से उत्पन्न होते हैं।
  • यह तकनीक कम लागत में बड़े क्षेत्र पर लागू की जा सकती है।
  • यह पर्यावरण के अनुकूल और दीर्घकालिक है।

🔬 सीखने योग्य बातें (Key Scientific Highlights):

  • Structural color प्रकृति से प्रेरित रंग देने की तकनीक है।
  • Polystyrene nanospheres के आकार और व्यवस्थित ढंग को नियंत्रित करके वांछित रंग उत्पन्न किए जा सकते हैं।
  • प्रकाश के साथ सामग्री की अंतःक्रिया का अध्ययन करके भविष्य की तकनीकें तैयार की जा सकती हैं।
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